नेपाल में आई फ़्लैश फ़्लड से मरने वालों की संख्या बढ़कर 469 हो गई है। अधिकारियों के मुताबिक़, 977 लोग अब भी लापता हैं। इनमें 517 विदेशी नागरिक शामिल हैं। प्रभावित इलाक़ों में खोज, बचाव और राहत अभियान जारी है।
नेपाल की सेना अब तक 883 लोगों को सुरक्षित निकाल चुकी है। अभियान में 13 हज़ार से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। बाढ़ ने नेपाल और चीन से जुड़े सीमा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जनहानि और संपर्क व्यवस्था की चुनौती पैदा की है।
चीन की भूमिका पर उठे सवाल
बाढ़ के बाद चीन पर आरोप लगाए गए कि उसने नेपाल को आपदा से पहले समय रहते चेतावनी नहीं दी। इस दावे के समर्थकों का कहना है कि पहले सूचना मिलती, तो जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता था। इन आरोपों का आधार सीमा पार बाढ़ से जुड़ी सूचना साझा करने की व्यवस्था को माना जा रहा है।
नेपाल स्थित चीनी दूतावास ने आरोपों और सोशल मीडिया पर वायरल खबरों को खारिज किया है। एक्स पर जारी पोस्ट में दूतावास ने इन खबरों को फ़ेक बताया। उसके मुताबिक़, 26 अगस्त को नेपाल में भूकंप या ग्लेशियर ढहने से भूकंप जैसी स्थिति बनी, जिसके बाद भूस्खलन हुआ। दूतावास ने कहा कि इस घटना में नेपाल और चीन, दोनों तरफ़ लोग मारे गए और कई लोग लापता हुए।
दूतावास ने रसुवा-ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र में अचानक आई बाढ़ पर दुख जताया और नेपाल को हरसंभव सहायता देने की बात कही। उसके शुरुआती आकलन के अनुसार, नेपाल की तरफ़ आए भूकंप से हिमस्खलन और मलबे का बहाव हुआ। इससे सीमा के दोनों ओर लोगों की मौत हुई और कई लोग लापता हैं।
सीमा पर सूचना और संपर्क का संकट
काठमांडू पोस्ट ने ल्हासा में नेपाल के कॉन्सल जनरल लक्ष्मी प्रसाद निरौला के हवाले से बताया कि दोनों देशों के अधिकारी सीमा पर तैनात सुरक्षा कर्मियों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। संपर्क टूटने के कारण बाढ़ की शुरुआत और उसके वास्तविक कारण पर आधिकारिक, विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं हो सकी है।
निरौला के अनुसार, चीनी अधिकारी भी अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि बाढ़ किस स्थान से शुरू हुई और उसका वास्तविक स्रोत क्या था। प्रभावित क्षेत्रों में संचार व्यवस्था ठप होने से वहां से भरोसेमंद जानकारी जुटाना मुश्किल बना हुआ है।
नेपाल के न्यूज़ आउटलेट ऑनलाइन ख़बर के मुताबिक़, इस घटना के बाद चीन के साथ आपदा संबंधी सूचनाएं रियल-टाइम में साझा करने की व्यवस्था को प्राथमिकता देने की मांग उठी है। यह मांग पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ ने गुरुवार को हुई सर्वदलीय बैठक में रखी। उन्होंने रसुवा की स्थिति को देखते हुए चीन के साथ सूचना साझा करने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई।
बाढ़ नेपाल से शुरू हुई या तिब्बत से?
डिजिटल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म उकेरा की रिपोर्ट के मुताबिक़, तिब्बत के केरुंग काउंटी में बुधवार सुबह करीब 10:30 बजे अचानक बाढ़ आई। नेपाल के समय के अनुसार यह करीब 8:15 बजे था। रिपोर्ट में कहा गया कि करीब 45 मिनट बाद बाढ़ का तेज़ बहाव नेपाल में भोटेकोशी नदी तक पहुंच गया।
नेपाल की नेशनल डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी की प्रवक्ता शांति महत के हवाले से बताया गया कि नेपाल को चीन की ओर से बाढ़ की जानकारी नहीं मिली थी। रसुवा के मुख्य ज़िला अधिकारी ने स्थानीय समयानुसार करीब 9 बजे फ़ोन करके प्राधिकरण को घटना की सूचना दी थी।
यही विवरण चीन के दूतावास के शुरुआती आकलन से अलग है। दूतावास ने बाढ़ से जुड़े भूकंप, हिमस्खलन और मलबे के बहाव का उल्लेख किया, जबकि दूसरी रिपोर्टों में शुरुआती बाढ़ का स्थान तिब्बत के केरुंग काउंटी में बताया गया। कुछ रिपोर्टों में बाढ़ का स्रोत नेपाल की तरफ़ होने की संभावना भी विशेषज्ञों के हवाले से सामने आई है।
अर्ली वॉर्निंग सिस्टम पर अब भी पुष्टि नहीं
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक़, अब तक यह पुष्टि नहीं हुई है कि चीन-नेपाल सीमा पर लगा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम आपदा से पहले किसी असामान्य गतिविधि का पता लगा पाया था या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस घटना से पहले कोई चेतावनी जारी की गई थी या नहीं।
इस सिस्टम से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार, उसने अब तक 7 बार समय रहते चेतावनी जारी की है। इनमें पिछले साल चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र के लिए जारी चेतावनी भी शामिल है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि बुधवार की ताज़ा आपदा में सिस्टम ने कोई चेतावनी दी थी या नहीं।
निगरानी उपकरणों की कमी का दावा
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने चीनी डिजिटल न्यूज़पेपर द पेपर में प्रकाशित विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया। चाइनीज़ एकेडमी ऑफ़ साइंसेज़ से जुड़े विशेषज्ञ कांग शिचांग के अनुसार, पहाड़ के ऊपरी हिस्से में बर्फ़ और चट्टानों के खिसकने का पहले पता चल जाए, तो करीब 20 मिनट पहले चेतावनी दी जा सकती है।
कांग शिचांग ने कहा कि क्षेत्र में निगरानी के लिए पर्याप्त उपकरण मौजूद नहीं हैं। उनके मुताबिक़, इस बार बाढ़ का स्रोत नेपाल की ओर बताया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सेंसर खतरे के संकेत पकड़ने तक मलबे और कीचड़ का तेज़ बहाव नीचे पहुंच सकता है।
अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में तिब्बत से आने वाली सूचनाओं पर चीन के कड़े नियंत्रण का मुद्दा उठाया है। इस बीच, नेपाल में बाढ़ के कारणों, चेतावनी की उपलब्धता और दोनों देशों के बीच रियल-टाइम आपदा सूचना साझा करने की व्यवस्था पर बहस जारी है।














