नेपाल और तिब्बत के सीमांत इलाके में आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे ग्लेशियर टूटने की अहम भूमिका सामने आई है। शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप के कारण भूस्खलन को इसकी वजह माना गया था। बाद में यूएस जियोलॉजिकल सर्वे (यूएसजीएस) ने इसे हिमनद के एक हिस्से के टूटने से जुड़ी घटना बताया।
यूएसजीएस के आंकड़ों और घटना का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक, एक विशाल ग्लेशियर घाटी की तलहटी से टकराया। इस टक्कर का असर पांच दशमलव दो तीव्रता वाले भूकंप जितना महसूस हुआ। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियर टूटने के बाद बर्फ तेजी से नीचे आई होगी।
लैंगटांग लिरुंग के पास टूटा ग्लेशियर
डंडी विश्वविद्यालय के ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. साइमन कुक ने बताया कि उनकी टीम ने नेपाल में लैंगटांग लिरुंग चोटी के पास ग्लेशियर के निचले हिस्से के टूटने के संकेत पाए। यह स्थान बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से लगभग पंद्रह किलोमीटर पश्चिम में है। उनके आकलन के अनुसार, ग्लेशियर पहले उत्तर-पश्चिम दिशा में टूटा और फिर पश्चिम की ओर बहती नदी में जा गिरा।
इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के विश्लेषण में इसे बर्फ और चट्टानों से बने मिश्रित हिमस्खलन की संभावना से जोड़ा गया है। इसके बाद बड़ी मात्रा में मलबा भोटेकोशी नदी की सहायक नदी लेंडे खोला में गिरा। नदी का पानी गाद और बड़े पत्थरों को साथ लेकर नीचे की ओर बहा।
आईसीआईएमओडी के अनुसार, निचले इलाकों में नदी का जलस्तर आधे घंटे के भीतर सात से नौ मीटर बढ़ गया। इस दौरान कई जल निगरानी केंद्र बह गए या क्षतिग्रस्त हो गए।
नदी में बना होगा अस्थायी बांध
ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय के अर्थ साइंस प्रोफेसर माइक सर्ल ने कहा कि भूस्खलन और बाढ़ के बीच की प्रक्रिया कई घंटे या कई दिन चल सकती है। उनके आकलन में पहले बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ होगा। उसके बाद पानी जमा होकर नदी पर अस्थायी बांध बना होगा। यह बांध टूटने पर पानी और मलबा तेज सैलाब के रूप में नीचे आया होगा।
क्षेत्र की भौगोलिक बनावट ने भी नुकसान बढ़ाया। लैंगटांग लिरुंग ऊंचे हिमालय में स्थित है और इसके दोनों ओर बहुत खड़ी घाटियां हैं। इन ढलानों के कारण पानी तेज गति से नीचे पहुंच सकता था।
ग्लेशियर के ढहने की तत्काल वजह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। सर्ल के मुताबिक, हिमालय के दूसरे हिस्सों की तरह लैंगटांग लिरुंग भी टेक्टोनिक (भूगर्भीय) हलचल के कारण धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। इस प्रक्रिया में एक प्लेट दूसरी प्लेट को ऊपर धकेलती है।
पहाड़ के ऊपर उठने से ग्लेशियर की ढलान बढ़ती जाती है। इससे उसके कुछ हिस्सों के टूटने की संभावना रहती है। आमतौर पर ऐसे हिस्से छोटे होते हैं। वे नदियों को कुछ समय के लिए रोकते हैं और बाद में बह जाते हैं।
इस घटना में पूरा ग्लेशियर एक साथ टूट गया लगता है। सर्ल ने इसे बहुत असामान्य बताया। उनके अनुसार, ऐसी बाढ़ की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन इस स्तर का असर आम नहीं है।
जलवायु परिवर्तन की संभावित भूमिका
सर्ल ने घटना को दो प्रक्रियाओं के मेल से जोड़ने की संभावना जताई। पहली प्रक्रिया हिमालय के ऊपर उठने से जुड़ी टेक्टोनिक हलचल है। दूसरी प्रक्रिया बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने से संबंधित जलवायु परिवर्तन है।
वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन हिमालय में बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी जमी हुई मिट्टी) के पिघलने की रफ्तार बढ़ा सकता है। इस साल की शुरुआत में आईसीआईएमओडी के विश्लेषण में कहा गया था कि हिंदूकुश के ग्लेशियरों से बर्फ हटने की गति साल दो हजार की तुलना में दोगुनी हो गई है। इससे बाढ़ जैसे खतरे बढ़ सकते हैं।
हालांकि, बुधवार को ग्लेशियर के ढहने की सटीक वजह अभी तय नहीं हुई है। उपलब्ध विश्लेषण में टेक्टोनिक हलचल, बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों का पिघलना, तीनों संभावित कारकों के रूप में सामने आए हैं।
दुनिया में ऐसी घटनाओं के उदाहरण
डॉ. कुक के मुताबिक, भारत, स्विट्जरलैंड और इटली में हाल के वर्षों में ग्लेशियर टूटने के बाद बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुई हैं। साल दो हजार इक्कीस में उत्तर भारत की चमोली घाटी में हिमालयी ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूट गया था। इससे पानी और मलबे का सैलाब आया और लगभग दो सौ लोगों की मौत हुई।
वैज्ञानिकों ने बाद में अनुमान लगाया था कि उस हिमखंड के ढहने का असर पंद्रह परमाणु बमों के बराबर रहा होगा। नेपाल में पिछले साल तिब्बत की एक हिमनद झील फटने के बाद भी बाढ़ आई थी।














