वंदे मातरम के सार्वजनिक गायन को लेकर कांग्रेस का पुराना फैसला एक बार फिर चर्चा में है। कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने पार्टी के कार्यक्रमों में गीत के केवल पहले दो पद गाने का निर्णय लिया है। यह फैसला स्वतंत्रता दिवस और गोवा के एक कार्यक्रम में गीत के गायन को लेकर बीजेपी के हमलों के बीच सामने आया।
कांग्रेस ने अपने रुख के समर्थन में 1937 में पारित प्रस्ताव का हवाला दिया है। पार्टी के मुताबिक, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर समेत स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं ने सार्वजनिक अवसरों पर पहले दो पदों के इस्तेमाल का समर्थन किया था।
विवाद की पृष्ठभूमि गीत के बाद के पदों से जुड़ी है। उनमें दुर्गा, सरस्वती और लक्ष्मी जैसी हिन्दू देवियों के संदर्भ आते हैं। भारत को पूजनीय देवी के रूप में प्रस्तुत करने वाली पंक्तियों को लेकर कुछ मुस्लिम नेताओं और समूहों ने आपत्ति जताई थी।
इतिहासकार मृदुला मुखर्जी के अनुसार, कांग्रेस ने इन आपत्तियों पर विचार करने के लिए एक उपसमिति बनाई थी। समिति ने टैगोर से सलाह ली, क्योंकि उन्होंने गीत को लोकप्रिय बनाने, उसमें संगीत देने और 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
टैगोर ने जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र में कहा था कि पूरी कविता को उसके संदर्भ के साथ पढ़ने पर ऐसी व्याख्याएं संभव हैं, जो मुस्लिम भावनाओं को आहत कर सकती हैं। हालांकि, उनके अनुसार पहले दो पदों से बना राष्ट्रगीत अलग पहचान हासिल कर चुका था और उसमें किसी समुदाय को ठेस पहुंचाने वाली बात नहीं थी।
30 अक्तूबर 1937 को कलकत्ता में हुई कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में इस विषय पर प्रस्ताव को अंतिम रूप दिया गया। बैठक की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की थी। राजेंद्र प्रसाद ने प्रस्ताव रखा और सरदार वल्लभभाई पटेल ने उसका समर्थन किया। महात्मा गांधी विशेष आमंत्रित के रूप में बैठक में शामिल थे।
टैगोर के 30 अक्तूबर 1937 के नोट के अनुसार, पहले दो पद मातृभूमि की सुंदरता और कल्याणकारी रूपों पर केंद्रित थे। उन्होंने बाद के चार पदों को उत्तेजक या भड़काऊ प्रकृति का बताया। 1939 में ‘हरिजन’ में महात्मा गांधी ने भी लगभग इसी विचार का समर्थन किया था।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम 1875 में लिखा था। इसके बाद इसके अन्य पद 1882 के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किए गए। 1896 में टैगोर ने इसे कांग्रेस अधिवेशन में गाया था।
कांग्रेस वर्किंग कमिटी की सिफारिश थी कि सार्वजनिक सभाओं में केवल पहले दो पद गाए जाएं और टैगोर द्वारा तैयार संस्करण तथा संगीत का ही अनुसरण हो। इसी ऐतिहासिक फैसले को लेकर आज की राजनीतिक बहस में पुराने नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।









