ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच तनाव बढ़ने से खाड़ी में टकराव का खतरा गहरा गया है। यूएई के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, ईरान से दो बैलिस्टिक मिसाइलें छोड़ी गईं, जो उसके समुद्री जहाजों को निशाना बना रही थीं। यूएई का कहना है कि दोनों मिसाइलें समुद्र में गिरीं और एक उसके क्षेत्रीय जल में पहुंची। ईरान ने इस आरोप से इनकार किया है।

इसके बाद यूएई के विदेश मंत्रालय ने ईरान के साथ व्यापार और सभी तरह के लेन-देन रोकने की घोषणा की। यह फैसला केवल मौजूदा सैन्य तनाव से जुड़ा कदम नहीं है। इसके असर को समझने के लिए दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे कारोबारी रिश्तों को देखना जरूरी है।

# खाड़ी के सामने-सामने बसे दो देश

ईरान और यूएई के बीच स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ है। आज का यूएई 1971 में सात अमीरात के मिलकर देश बनने से अस्तित्व में आया। इनमें अबू धाबी, दुबई, शारजाह, अजमान, उम्म अल क्वैन, फ़ुजैराह और रास अल ख़ैमाह शामिल हैं। इससे पहले ये अमीरात ब्रिटिश संरक्षण में अलग-अलग शेखों के अधीन चलते थे।

उस समय समुद्र के दूसरी ओर ईरान खाड़ी की सबसे ताकतवर शक्तियों में गिना जाता था। शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन में देश तेल की आय, आधुनिक शहरों और मजबूत सेना के लिए जाना जाता था। इसके मुकाबले खाड़ी के अमीरात छोटे और कम विकसित माने जाते थे।

दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय विवाद भी पुराना है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में मौजूद अबू मूसा, ग्रेटर टन्ब और लेसर टन्ब द्वीपों पर ईरान अपना दावा करता रहा है। 1971 में ब्रिटिश सेना की वापसी के समय ईरान ने इन तीनों द्वीपों पर कब्जा कर लिया। शारजाह और रास अल ख़ैमाह इन पर अपना अधिकार जताते थे।

# प्रतिबंधों के बीच दुबई का महत्व

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंध बढ़े। तेल बेचने, जरूरी सामान मंगाने और विदेशी भुगतान करने में उसके सामने मुश्किलें खड़ी हुईं। ऐसे समय में यूएई, खासकर दुबई, ईरान के लिए दुनिया से जुड़ने का अहम रास्ता बन गया।

ईरानी सामान दुबई के जरिए आता-जाता रहा। व्यापारियों ने वहां कारोबार शुरू किया और बड़ी संख्या में ईरानी परिवार बस गए। अनुमान के मुताबिक, 5 लाख ईरानी दुबई में रहने लगे। दुबई के बाजार और बैंक ईरानी कारोबार तथा भुगतान व्यवस्था से जुड़े रहे।

ईरान को जरूरी सामान दुबई में आयात किया जाता था। इसके बाद ईरानी व्यापारी छोटी नावों से सामान बंदर अब्बास तक पहुंचाते थे। भुगतान हवाला के जरिए होने की बात भी सामने आती रही। ईरानी तेल को दूसरे टैंकरों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे में यूएई के साथ व्यापार रुकना ईरान के लिए आर्थिक और कारोबारी दबाव बढ़ा सकता है।