भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अज़रबैजान की राजधानी बाकू में स्थित अतेशगाह अग्नि मंदिर का दौरा किया। उन्होंने इस स्थल को दोनों देशों के लोगों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बताया।
अतेशगाह सुराखानी के पास अबशेरोन प्रायद्वीप में स्थित है। यह परिसर अग्नि वेदी, भारतीय अभिलेखों और उस क्षेत्र की आग से जुड़ी धार्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। अतेशगाह नाम फ़ारसी भाषा से आया है और इसका अर्थ 'अग्नि का घर' है।
देवनागरी में धार्मिक अभिलेख
इस परिसर में देवनागरी लिपि में 'श्री गणेशाय नमः' लिखा हुआ है। इसके अलावा देवनागरी में पाँच अन्य पंक्तियां भी मौजूद हैं। इनमें हिंदू अग्नि देवी ज्वाला जी और अन्य देवी-देवताओं का आह्वान किया गया है।
बाकू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, अतेशगाह में देवनागरी लिपि के 18 अभिलेख हैं। इनमें से अधिकतर की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से होती है। ज्वाला जी का उल्लेख एक दर्जन से अधिक बार मिलता है। परिसर के लेखों में संस्कृत के साथ पंजाबी का इस्तेमाल भी दिखाई देता है और उनमें हिंदू तथा सिख परंपराओं से जुड़े संकेत मिलते हैं।
इन अभिलेखों में गणेश और शिव सहित कई देवताओं का उल्लेख है। पवित्र अग्नि की आराधना का संबंध ज्वाला जी से जोड़ा गया है। यह सामग्री अतेशगाह को भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े स्थल के रूप में सामने लाती है।
प्राकृतिक आग से जुड़ा इतिहास
अबशेरोन प्रायद्वीप में धरती के भीतर से प्राकृतिक गैस निकलने के कारण कई जगह आग की लपटें उठती थीं। इसी प्राकृतिक घटना ने इस स्थान को धार्मिक महत्व देने में भूमिका निभाई। अज़रबैजान को अक्सर 'अग्नि की भूमि' भी कहा जाता है।
इस क्षेत्र के शुरुआती इतिहास को पारसी धर्म से जोड़ा जाता है। हालांकि, आज दिखाई देने वाला अतेशगाह परिसर मुख्य रूप से बाद के निर्माण काल का है। इसलिए प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और मौजूदा इमारतों की उम्र को एक ही बात नहीं माना जा सकता।
यूनेस्को के अनुसार, परिसर की इमारतें 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच बनीं। आधिकारिक विवरण के मुताबिक, 17वीं शताब्दी में यहां तीर्थयात्रियों की आवाजाही फिर बढ़ी। 1683 में यहां पहुंचे जर्मन यात्री एंगेलबर्ट कैम्फर ने दर्ज किया था कि तीर्थयात्रियों ने उसी शताब्दी के मध्य के आसपास परिसर के पुनर्निर्माण की शुरुआत की थी। निर्माण का यह दौर 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक चलता रहा और परिसर ने अपना मौजूदा स्वरूप हासिल किया।
भारतीय व्यापारियों और यात्रियों का संबंध
अतेशगाह का भारतीय संबंध इसके इतिहास का अहम हिस्सा है। यूनेस्को को दिए गए अज़रबैजान के दस्तावेज़ में इसे मुल्तान के श्रद्धालुओं के लिए तीर्थस्थल और दार्शनिक केंद्र बताया गया है। ये श्रद्धालु कैस्पियन क्षेत्र के साथ व्यापार भी करते थे।
मुल्तान अब पाकिस्तान में है, लेकिन वह व्यापक भारतीय उपमहाद्वीप के व्यापारिक और धार्मिक नेटवर्क से जुड़ा था। भारतीय व्यापारियों और तीर्थयात्रियों ने परिसर के निर्माण तथा रखरखाव के लिए आर्थिक मदद दी और इसका इस्तेमाल भी किया। अतेशगाह इसी वजह से धार्मिक आस्था, यात्राओं और कारोबार के पुराने संपर्कों को एक साथ दिखाता है।
अज़रबैजान सिल्क रूट का हिस्सा था, जो एशिया और यूरोप को जोड़ता था। 2018 में 'द श्राइन ऑफ डेथ' की लेखिका दिव्या कुमार ने 'द हिन्दू' में इस मंदिर पर लिखते हुए इसे इतिहास, वैश्वीकरण और भारतीय उपमहाद्वीप तथा यूरोप के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़ी धरोहर बताया था।
दिव्या कुमार के अनुसार, भारतीय यात्री और तीर्थयात्री 16वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों तथा 17वीं शताब्दी की शुरुआत में इस क्षेत्र में पहुंचे। उन्होंने गणेश और शिव जैसे देवी-देवताओं की पूजा के साथ यहां की पवित्र अग्नि की भी आराधना की। उनके लेख में अतेशगाह के इतिहास को 16वीं शताब्दी तक पहुंचने वाला बताया गया है।
आज मुख्य अग्नि कुंड और परिसर के दो गोलाकार चबूतरों पर जलने वाली आग को बाकू की मुख्य गैस पाइपलाइन से गैस मिलती है। दिव्या कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, अतीत में ये ज्वालाएं प्राकृतिक गैस के धरती से बाहर आने और हवा के संपर्क में आग पकड़ने से जलती थीं। यात्रियों के विवरणों में इस क्षेत्र की 'अनंत ज्वालाओं' का उल्लेख 7वीं शताब्दी तक मिलता है।
निष्कर्ष
अतेशगाह अग्नि मंदिर प्राकृतिक आग, धार्मिक आस्था और पुराने व्यापारिक मार्गों के मेल का ऐतिहासिक उदाहरण है। जयशंकर का दौरा इस स्थल को भारत और अज़रबैजान के साझा सांस्कृतिक संबंधों के संदर्भ में फिर चर्चा में लाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. अतेशगाह अग्नि मंदिर कहां है?
यह अज़रबैजान की राजधानी बाकू के पास सुराखानी में, अबशेरोन प्रायद्वीप पर स्थित है।
Q. अतेशगाह नाम का क्या अर्थ है?
अतेशगाह फ़ारसी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ 'अग्नि का घर' है।
Q. अतेशगाह में भारतीय संबंध के कौन से प्रमाण हैं?
परिसर में देवनागरी, संस्कृत और पंजाबी के अभिलेख हैं। इनमें गणेश, शिव और ज्वाला जी सहित धार्मिक संदर्भ मिलते हैं।
Q. अतेशगाह में कितने देवनागरी अभिलेख बताए गए हैं?
बाकू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, यहां देवनागरी लिपि में 18 अभिलेख हैं।
Q. अतेशगाह की मौजूदा इमारतें किस दौर की हैं?
यूनेस्को के अनुसार, परिसर की इमारतें 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच की हैं।
Q. अतेशगाह की आग का प्राकृतिक आधार क्या था?
अबशेरोन क्षेत्र में धरती के भीतर से प्राकृतिक गैस निकलती थी, जो हवा के संपर्क में आकर आग पकड़ लेती थी।
Q. अतेशगाह का संबंध किन लोगों से बताया गया है?
अज़रबैजान के दस्तावेज़ में इसे मुल्तान के श्रद्धालुओं का तीर्थस्थल और दार्शनिक केंद्र बताया गया है।






