कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ़ नीति और दबाव की रणनीति के सामने खुलकर जवाब देने का फैसला किया है। इसके उलट, भारत ने अमेरिका के साथ व्यापक रिश्तों को ध्यान में रखते हुए टकराव सीमित रखने और बातचीत जारी रखने का रास्ता चुना है।
कनाडा ने अमेरिकी दबाव के सामने “डॉलर के बदले डॉलर” जवाबी कार्रवाई का संकल्प लिया है। ट्रंप के 50 फ़ीसदी टैरिफ़ से प्रभावित कनाडाई सामान की कीमत करीब 20 अरब डॉलर बताई गई है। इस कदम का असर दोनों देशों के कारोबार और कामगारों पर पड़ सकता है।
कार्नी का कहना है कि अमेरिका की कुछ मांगें कनाडा की संप्रभुता को कमज़ोर कर सकती हैं। इनमें कनाडा की दूसरे देशों के साथ व्यापार समझौते करने की क्षमता सीमित करना भी शामिल है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से बातचीत रोक दी है और जवाबी टैरिफ़ लगाने की बात कही है।
कार्नी का रुख़ और कनाडा की निर्भरता
कनाडा की अर्थव्यवस्था अमेरिका से गहराई से जुड़ी हुई है। 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, कनाडा के कुल निर्यात का 77 फ़ीसदी अमेरिका जाता है। इसके बावजूद कार्नी ने ट्रंप की शर्तों को स्वीकार करने के बजाय चुनौती देने का रास्ता चुना है।
कनाडाई वाइन, डेयरी उत्पाद, फर्नीचर, कपड़े, सीमेंट और हॉकी उपकरणों पर टैरिफ़ का असर पड़ रहा है। ट्रंप की धमकियों के बाद शुरू हुआ “बाय कैनेडियन” अभियान भी लोकप्रिय हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में कनाडाई लोग सरकार के जवाबी रुख़ का समर्थन कर रहे हैं।
ट्रंप कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कह चुके हैं। कनाडा और अमेरिका के बीच कारोबारी रिश्तों की गहराई को देखते हुए कनाडा की नाराज़गी का असर अमेरिकी उत्पादकों, सीमा से जुड़े राज्यों और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
कनाडा के पास अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए ऊर्जा और पोटाश जैसे उत्पादों का निर्यात सीमित करने का विकल्प है। पोटाश उर्वरक में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख घटक है। ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने कहा है कि ट्रेड वार गहराने पर कनाडा अमेरिका को बिजली की आपूर्ति रोक सकता है।
ओंटारियो न्यूयॉर्क, मिशिगन और मिनेसोटा समेत कई अमेरिकी राज्यों को बिजली देता है। कार्नी ने फोर्ड के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि कोई भी विकल्प बातचीत की मेज से बाहर नहीं है।
दावोस के आकलन से जवाबी नीति तक
कार्नी ने जनवरी में दावोस में कहा था कि दुनिया महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के दौर में है। उनके मुताबिक, नियमों पर आधारित वैश्विक व्यवस्था कमज़ोर पड़ रही है और शक्तिशाली देश अपनी क्षमता के अनुसार कदम उठा रहे हैं।
उन्होंने मध्यम शक्ति वाले देशों से साथ आने की अपील की थी। अब उनकी नीति को उसी आकलन पर अमल के रूप में देखा जा रहा है।
भू-राजनीति के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन के साथ हर बातचीत शक्ति-परीक्षण जैसी होती है। उनके मुताबिक, ट्रंप अपने तय लक्ष्यों और शर्तों को लगातार बदलते रहते हैं। चेलानी ने कार्नी के रुख़ को ऐसा कदम बताया, जिसे अपनाने की हिम्मत बहुत कम नेताओं ने दिखाई है।
भारत ने अलग रास्ता क्यों चुना?
भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील हुई है। लेख में इसे अमेरिका के पक्ष में अधिक झुकी हुई व्यवस्था बताया गया है। राजनीति विज्ञानी भरत कर्नाड ने नरेंद्र मोदी की ट्रंप के प्रति संयमित प्रतिक्रिया की आलोचना की है। उनके अनुसार, भारत को अमेरिका पर निर्भरता घटानी चाहिए, बातचीत में सख़्त रुख़ रखना चाहिए और वैकल्पिक साझेदारियां बनानी चाहिए।
कर्नाड ने कनाडा के रुख़ को इसलिए महत्वपूर्ण बताया है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका पर भारत से अधिक निर्भर है। उनका तर्क है कि भारत अमेरिका पर कम आर्थिक निर्भरता के बावजूद ट्रंप के टैरिफ़ दबाव के सामने जवाबी कार्रवाई के बजाय रियायतें दे रहा है।
कर्नाड के मुताबिक, ट्रंप की नीति को अस्थायी बदलाव नहीं समझना चाहिए। भारत को अमेरिकी विदेश नीति में लंबे समय के बदलाव के रूप में इसे देखते हुए भविष्य के दबावों और मांगों के लिए तैयार रहना चाहिए।
भारत के सामने मामला केवल टैरिफ़ विवाद का नहीं है। अमेरिका के साथ उसके संबंध तकनीक, रक्षा, निवेश, वीज़ा, ऊर्जा और इंडो पैसिफिक में रणनीतिक संतुलन से जुड़े हैं। चीन भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में भारत को अमेरिका के साथ रक्षा, ख़ुफ़िया, तकनीक और कूटनीतिक तालमेल की जरूरत बनी हुई है।
इसी वजह से भारत के लिए कनाडा जैसा सीधा टकराव रणनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। लेख में मोदी सरकार की संभावित रणनीति विवाद को सीमित रखने, बड़े रणनीतिक रिश्ते को बचाने और ट्रंप के साथ मतभेद को व्यक्तिगत मुकाबले में बदलने से रोकने के रूप में बताई गई है।
भारत के सीमित जवाबी विकल्प
विश्व व्यापार संगठन में भारत के राजदूत रह चुके जयंत दासगुप्ता ने भारत के लिए अमेरिकी आयात पर जवाबी टैरिफ़ की कठिनाइयों को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि भारत अमेरिका से खनिज ईंधन और तेल, कटे और बिना घिसे हीरे, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल्स, प्लास्टिक तथा फल-सूखे मेवे आयात करता है।
इनमें अधिकतर उत्पाद कच्चे माल या इंटरमीडिएट स्तर के हैं। ऐसे सामान पर अमेरिका के खिलाफ टैरिफ़ लगाने से भारत के घरेलू और निर्यात बाजारों को नुकसान हो सकता है। दासगुप्ता के मुताबिक, जवाबी शुल्क का असर सर्विस सेक्टर पर भी पड़ सकता है।
यही अंतर कनाडा और भारत की रणनीति को अलग करता है। कनाडा अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भर होने के बावजूद ऊर्जा, बिजली और दूसरे उत्पादों के जरिए दबाव बना सकता है। भारत के लिए आयात शुल्क बढ़ाने का सीधा असर अमेरिकी पक्ष पर डालना आसान नहीं है, क्योंकि अमेरिका के पास कई उत्पादों के दूसरे स्रोत उपलब्ध हैं।













