एनएसई पर अगस्त सीरीज के इंडेक्स और सिंगल-स्टॉक डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की एक्सपायरी मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को होगी। इस मौके पर सिंगल-स्टॉक ऑप्शंस में केवल ₹3-4 का प्रीमियम कमाने की कोशिश ट्रेडर्स के लिए बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी बन सकती है।
सीएनबीसी आवाज़ के मैनेजिंग एडिटर अनुज सिंघल ने एक्सपायरी के करीब आउट ऑफ द मनी यानी ओटीएम स्टॉक ऑप्शंस में सावधानी बरतने को कहा है। कई ट्रेडर्स मान लेते हैं कि शेयर के मौजूदा भाव से दूर ऑप्शन शायद बेकार एक्सपायर हो जाएगा। इसी उम्मीद में वे छोटा प्रीमियम पाने के लिए ऑप्शन बेचते हैं।
जोखिम तब बढ़ता है, जब एक्सपायरी के दिन शेयर में अचानक तेज उतार-चढ़ाव आ जाए। सुबह ओटीएम दिख रहा ऑप्शन बाजार बंद होने तक इन द मनी यानी आईटीएम हो सकता है। ऐसी स्थिति में मामला सिर्फ मिले हुए प्रीमियम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे लॉट के शेयरों की डिलिवरी की जिम्मेदारी बन सकती है।
इंडेक्स डेरिवेटिव और सिंगल-स्टॉक डेरिवेटिव में यह अंतर समझना जरूरी है। निफ्टी या बैंक निफ्टी जैसे इंडेक्स डेरिवेटिव कैश में सेटल होते हैं। इनमें किसी कंपनी के वास्तविक शेयर देने या लेने की जरूरत नहीं होती। इसके विपरीत, एक्सपायरी तक बची आईटीएम सिंगल-स्टॉक फ्यूचर्स और ऑप्शंस पोजिशन फिजिकल सेटलमेंट में जा सकती है।
शॉर्ट कॉल रखने वाले ट्रेडर को कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार शेयर देने पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए, ₹1,000 के भाव वाले शेयर का ₹1,050 स्ट्राइक कॉल ₹4 में बेचने पर शेयर के ₹1,060 या उससे ऊपर बंद होने की स्थिति बदल सकती है। अगर लॉट में 500 शेयर हों, तो डिलिवरी की जिम्मेदारी बन सकती है। शेयर उपलब्ध नहीं होने पर शॉर्ट डिलिवरी और बाय-इन ऑक्शन की स्थिति आ सकती है।
कॉल खरीदने वाले ट्रेडर के लिए भी जोखिम खत्म नहीं होता। आईटीएम कॉल पर पूरे लॉट के शेयर खरीदने पड़ सकते हैं और इसके लिए पर्याप्त नकदी चाहिए। पैसा उपलब्ध न होने पर ब्रोकर पोजिशन पहले बंद कर सकता है। ब्रोकरों की स्क्वायर-ऑफ टाइमिंग और फिजिकल सेटलमेंट नीतियां अलग हो सकती हैं।
पुट ऑप्शन में जिम्मेदारी उलट जाती है। आईटीएम पुट खरीदने वाले को शेयर देने पड़ सकते हैं, जबकि पुट बेचने वाले को पूरे लॉट के शेयर खरीदने पड़ सकते हैं। स्टॉक फ्यूचर्स में लॉन्ग पोजिशन पर शेयर लेने और शॉर्ट पोजिशन पर शेयर देने की जिम्मेदारी बन सकती है।
ट्रेडर्स को अपने सिंगल-स्टॉक डेरिवेटिव पोजिशन की समीक्षा करनी चाहिए। जो लोग फिजिकल डिलिवरी नहीं चाहते, उन्हें ब्रोकर की समय-सीमा से पहले पोजिशन बंद करने पर विचार करना चाहिए। एक्सपायरी तक पोजिशन रखने वालों को पूरे कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से पैसा या शेयर तैयार रखने होंगे। फिजिकल सेटलमेंट पर डिलिवरी आधारित एसटीटी और अन्य चार्ज भी लागू हो सकते हैं।












