अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंधों को आर्थिक दबाव की अपनी अब तक की सबसे कड़ी कार्रवाई बताया है। इनका लक्ष्य ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग करना और उसके राजस्व के संभावित स्रोतों को रोकना है। हालांकि, इन कदमों का असर ईरान के व्यापारिक साझेदारों के रुख पर निर्भर करेगा।

ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनिज़ादेह ने कहा कि उनका देश प्रतिबंधों से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी कदमों से वॉशिंगटन को “एक और हार” का सामना करना पड़ेगा। उनके मुताबिक, सरकार के पास इन घटनाओं के प्रबंधन के लिए दो साल की योजना है।

मदनिज़ादेह ने यह भी कहा कि ईरान के पास अपने तरीके हैं और वह जानता है कि ऐसे हालात से कैसे निपटना है। अमेरिका की घोषणा के कुछ घंटे बाद ईरान ने भरोसा जताया कि वह दूसरे देशों के साथ व्यापार जारी रख सकेगा।

चीन और रूस के रुख पर ईरान को भरोसा

ईरानी मंत्री ने कहा कि “न तो चीन और न ही रूस ने अमेरिकी कदमों” को स्वीकार किया है। उन्होंने अनुमान जताया कि दूसरे देश भी इन प्रतिबंधों का विरोध कर सकते हैं।

चीन ने अमेरिकी कार्रवाई को “अवैध एकतरफ़ा प्रतिबंध” बताया और इसका कड़ा विरोध किया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियांग ने कहा कि आर्थिक दबाव की रणनीति समस्याओं का समाधान नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि बीजिंग अपने हितों की रक्षा करेगा।

चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। उसने पिछले अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करते हुए ईरान के साथ व्यापार जारी रखा है। यही वजह है कि अर्थशास्त्रियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि नए प्रतिबंध वास्तविक रूप से कितने प्रभावी होंगे।

दूसरी ओर, ईरान के एक अन्य व्यापारिक साझेदार संयुक्त अरब अमीरात ने पिछले हफ़्ते कहा कि वह ईरान के साथ सभी वित्तीय लेनदेन रोक रहा है। इससे ईरान के सामने साझेदार देशों के अलग-अलग रुख की चुनौती भी सामने आती है।

अमेरिका ने किन क्षेत्रों को निशाना बनाया

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि ईरान के साथ वित्तीय साझेदारी करने वाले देशों को अलग-थलग किया जाएगा। ईरान के साथ व्यापार जारी रखने वाले बैंक और व्यवसाय भी कार्रवाई की जद में आएंगे।

बेसेंट के मुताबिक, अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने ईरान से जुड़े डिजिटल संपत्ति, प्रौद्योगिकी, सोना, विमानन और शिपिंग क्षेत्रों के खिलाफ कदम उठाए हैं। मंत्रालय ने लगभग 60 संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाज़ों पर प्रतिबंध लगाए हैं।

अमेरिका ने ईरान की मदद करने या उसके साथ कारोबार करने वाली सरकारों और संस्थाओं को भी चेतावनी दी है। बेसेंट ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप दुनिया के नेताओं से ईरान के साथ संबंध खत्म करने का अनुरोध करेंगे।

उन्होंने कहा कि नए प्रतिबंधों को समझने के लिए लोगों को समय देना जरूरी है। साथ ही, उन्होंने चेतावनी दी कि अमेरिका तेजी से कार्रवाई करेगा और इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।

अमेरिकी वित्त मंत्री ने ईरान के प्रतिबंधों से बचने के तरीकों की पहचान किए जाने का दावा किया। उन्होंने कार्रवाई को ईरान के वैश्विक वित्तीय संबंधों के खिलाफ “आर्थिक हमला” बताया। उनके अनुसार, ईरान के सामने वैश्विक अलगाव या वैश्विक अर्थव्यवस्था में लौटने की दिशा में आगे बढ़ने का विकल्प है।

तेल और होर्मुज़ को लेकर बढ़ी चिंता

इन घटनाक्रमों के बीच युद्ध के कारण दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ी हैं। ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध जारी रहा, तो वह इस क्षेत्र से सभी तेल निर्यात बंद कर देगा।

ईरान ने जहाज़ों को बिना अनुमति होर्मुज़ से गुजरने के खिलाफ नई चेतावनी भी जारी की है। दुनिया का लगभग 20 फ़ीसदी तेल और गैस इसी संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है।

फ़रवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद से ईरान ने इस प्रवाह में प्रभावी रूप से रुकावट पैदा की है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ी हैं।

प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर सवाल

कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुख्य जलवायु और कमोडिटी अर्थशास्त्री डेविड ऑक्सले ने नए प्रतिबंधों के असर पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी पहले ही ईरान के तेल निर्यात को बाधित कर रही है।

ऑक्सले के अनुसार, ऐसी स्थिति में ईरान के ऊर्जा राजस्व पर “आर्थिक डी-डे” का अतिरिक्त असर कुछ हद तक ना के बराबर साबित हो सकता है।

इस आकलन से संकेत मिलता है कि प्रतिबंधों की घोषणा राजनीतिक और वित्तीय दबाव बढ़ा सकती है, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि चीन और दूसरे व्यापारिक साझेदार ईरान के साथ अपने संबंधों को कितना जारी रखते हैं।