हिमालय के ग्लेशियर पहले की तुलना में 65% तेजी से पिघल रहे हैं। एक स्टडी के मुताबिक हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र अब ऐसे मोड़ की ओर बढ़ रहा है, जहां ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी पहले बढ़ेगा और बाद में घटने लगेगा। इस बदलाव का सीधा असर पानी की सुरक्षा, खेती और आजीविका पर पड़ सकता है।
इस स्थिति को पीक वॉटर (Peak Water) कहा गया है। स्टडी के अनुसार मध्य सदी तक क्षेत्र अधिकतम जल प्रवाह के इस चरण तक पहुंच सकता है। इसके बाद नदियों में पानी कम होने लगेगा। हिमालय से निकलने वाली नदियों पर निर्भर आबादी के लिए यह बदलाव लंबे समय में गंभीर चुनौती बन सकता है।
ग्लेशियरों के पीछे बन रही अस्थिर झीलें
अगस्त के अंत में नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक हिमालयी ग्लेशियर अचानक ढह गया। इसके बाद घाटियों में कई भूस्खलन और बाढ़ आईं। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में 1300 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 5300 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं।
यह घटना ग्लेशियरों की बढ़ती अस्थिरता से जुड़े खतरे को सामने लाती है। ग्लेशियर पीछे हटने के बाद उनके पीछे पानी की ऐसी झीलें बन रही हैं, जो ढीली चट्टानों और बर्फ से घिरी होती हैं। इन झीलों के टूटने पर नीचे की घाटियों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
निगरानी में बड़ी कमी
यह स्टडी सिस्टमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और भारत के जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट ने मिलकर तैयार की है। इसमें हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से घटते द्रव्यमान को रेखांकित किया गया है।
यह पर्वतीय क्षेत्र अफगानिस्तान से म्यांमार तक 8 देशों में फैला है। यहां अनुमानित 40 हजार ग्लेशियर हैं, लेकिन जमीन पर केवल 21 ग्लेशियरों की निगरानी हो रही है। निगरानी का यह अंतर जोखिमों की समय पर पहचान को मुश्किल बनाता है।
भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें 56 झीलों को बहुत उच्च जोखिम वाला माना गया है। इन झीलों के नीचे रहने वाले लाखों लोगों के लिए अचानक बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
पानी और अर्थव्यवस्था पर असर
पीक वॉटर के करीब पहुंचने पर नदियों का प्रवाह पहले बढ़ सकता है। इसके बाद पानी की मात्रा घटने लगेगी। इससे पेयजल, खेती और जलविद्युत परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है। रोजमर्रा की पानी की जरूरतें भी इस बदलाव से प्रभावित हो सकती हैं।
हिमालय भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और देश के सकल घरेलू उत्पाद का 20% से ज्यादा हिस्सा इससे प्रभावित होता है। सैकड़ों करोड़ लोग हिमालय से निकलने वाली नदियों पर निर्भर हैं।
हिमालय भारत की भूमि का करीब 18% हिस्सा है, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में इसकी हिस्सेदारी लगभग 35% है। ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़, भूस्खलन और सूखे जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर खेती और उन समुदायों पर पड़ सकता है, जिनकी आजीविका स्थानीय पानी और पहाड़ी संसाधनों पर निर्भर है।
आगे किन कदमों की जरूरत
स्टडी बेहतर ग्लेशियर निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और जलवायु अनुकूलन पर जोर देती है। जोखिम वाली झीलों की लगातार जांच और स्थानीय समुदायों की तैयारी को भी जरूरी बताया गया है।
हिमालय भारत के साथ पूरे दक्षिण एशिया के लिए पानी का अहम स्रोत है। ग्लेशियरों में तेजी से हो रहे बदलाव के बीच बाढ़ और बाद में पानी की कमी, दोनों जोखिमों पर ध्यान देना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
हिमालय के ग्लेशियरों का तेज पिघलना पानी, खेती, ऊर्जा और आजीविका से जुड़ा साझा खतरा बन रहा है। स्टडी के मुताबिक निगरानी, शुरुआती चेतावनी और स्थानीय तैयारी को मजबूत करना इस जोखिम से निपटने की मुख्य जरूरत है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. हिमालय के ग्लेशियर कितनी तेजी से पिघल रहे हैं?
ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में 65% तेजी से पिघल रहे हैं।
Q. पीक वॉटर क्या होता है?
पीक वॉटर वह चरण है जब ग्लेशियरों से नदियों में पानी का प्रवाह अधिकतम स्तर पर पहुंचता है। इसके बाद प्रवाह घटने लगता है।
Q. हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में कितने देश शामिल हैं?
यह क्षेत्र अफगानिस्तान से म्यांमार तक 8 देशों में फैला है।
Q. भारत में कितनी ग्लेशियल झीलें उच्च जोखिम वाली हैं?
भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाला माना गया है। इनमें 56 बहुत उच्च जोखिम वाली हैं।
Q. ग्लेशियरों के पिघलने से किन क्षेत्रों पर असर पड़ेगा?
खेती, जलविद्युत परियोजनाओं, रोजमर्रा के पानी और लाखों लोगों की आजीविका पर असर पड़ सकता है।
Q. ग्लेशियर झीलें खतरनाक क्यों हैं?
इन झीलों के टूटने पर नीचे की घाटियों में अचानक बाढ़ आ सकती है।
Q. स्टडी में कौन से उपाय सुझाए गए हैं?
बेहतर निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, जलवायु अनुकूलन और जोखिम वाली झीलों की लगातार जांच पर जोर दिया गया है।











