आकलन वर्ष 2026-27 के लिए टैक्स ऑडिट की जरूरत नहीं रखने वाले फ्रीलांसर 31 अगस्त 2026 तक आयकर रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इन मामलों में आम तौर पर ITR-3 या अनुमानित कराधान व्यवस्था चुनने पर ITR-4 का इस्तेमाल होता है।

टैक्स ऑडिट की जरूरत फ्रीलांसर के टर्नओवर या सकल प्राप्तियों पर निर्भर करती है। जिन मामलों में ऑडिट जरूरी है, उनकी ऑडिट रिपोर्ट जमा करने की आखिरी तारीख 30 सितंबर 2026 है। ऐसे मामलों में ITR दाखिल करने की अंतिम तारीख 31 अक्टूबर 2026 है।

सही ITR फॉर्म चुनना जरूरी

फ्रीलांसिंग से हुई कमाई आम तौर पर कारोबार या पेशे से आय मानी जाती है। स्वतंत्र पेशा, कंसल्टेंसी या कारोबार करने वाला व्यक्ति सामान्य तौर पर ITR-3 दाखिल करता है।

योग्य निवासी व्यक्तिगत फ्रीलांसर धारा 44ADA के तहत अनुमानित कराधान व्यवस्था चुनकर ITR-4 दाखिल कर सकते हैं। आकलन वर्ष 2026-27 में ITR-4 उन लोगों के लिए उपलब्ध है, जिनकी कुल आय 50 लाख रुपये तक है।

इस फॉर्म के लिए कारोबार या पेशे से आय धारा 44AD, 44ADA या 44AE के तहत होनी चाहिए। इसमें धारा 112A के तहत दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ 1.25 लाख रुपये तक होने की शर्त भी बताई गई है।

फ्रीलांसरों के लिए ITR भरने की नई डेडलाइन, फॉर्म, खर्च और विदेशी कमाई में न करें ये गलतियां के मुख्य तथ्यों को समझाता इन्फोग्राफिक।Image- AI generatedफ्रीलांसरों के लिए ITR भरने की नई डेडलाइन, फॉर्म, खर्च और विदेशी कमाई में न करें ये गलतियां के मुख्य तथ्यों को समझाता इन्फोग्राफिक।

फ्रीलांसर को केवल आसान लगने वाला फॉर्म नहीं चुनना चाहिए। फॉर्म का चुनाव उसकी आय, पेशे और कर व्यवस्था के आधार पर होना चाहिए।

हर पेशेवर भुगतान का मिलान करें

रिटर्न में दिखाई गई आय का मिलान वित्तीय रिकॉर्ड से होना चाहिए। इसके लिए इनवॉइस के आधार पर पेशेवर प्राप्तियों का रिकॉर्ड रखना जरूरी है।

सकल प्राप्तियों का मिलान बैंक स्टेटमेंट, इनवॉइस, फॉर्म 26AS, AIS और फॉर्म 16A में दिख रहे TDS से किया जा सकता है। जहां लागू हो, वहां GST रिकॉर्ड भी मिलाना चाहिए।

अलग-अलग प्लेटफॉर्म, कई बैंक खातों या पेमेंट गेटवे से मिली रकम छूटनी नहीं चाहिए। पूरे साल की कुल पेशेवर प्राप्तियां ही रिटर्न में दिखाई जानी चाहिए।

फ्रीलांस कमाई पर टैक्स कैसे लगता है

स्वतंत्र पेशे, कंसल्टेंसी या कारोबार से हुई कमाई आम तौर पर “कारोबार या पेशे के लाभ और प्राप्तियां” के तहत आती है। हर भुगतान को अलग से अन्य स्रोतों की आय मानकर टैक्स नहीं लगाया जाता।

नियमित कर व्यवस्था में कर योग्य पेशेवर आय निकालने के लिए सकल पेशेवर प्राप्तियों में से मान्य कारोबारी या पेशेवर खर्च घटाए जाते हैं। बची हुई आय पर लागू व्यक्तिगत स्लैब दरों के अनुसार टैक्स लगता है।

इसलिए सकल फ्रीलांस प्राप्तियों और कर योग्य पेशेवर आय के बीच अंतर समझना जरूरी है।

कौन से खर्च घटाए जा सकते हैं

धारा 37(1) के तहत कारोबार या पेशे के लिए पूरी तरह और विशेष रूप से किए गए खर्च का दावा किया जा सकता है। खर्च पूंजीगत या व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए।

नियमित कर व्यवस्था में आम तौर पर इन काम से जुड़े वास्तविक खर्चों का दावा किया जा सकता है:

  • लैपटॉप और दूसरे उपकरण
  • सॉफ्टवेयर और सब्सक्रिप्शन
  • इंटरनेट और फोन का खर्च
  • ऑफिस या कोवर्किंग का किराया
  • पेशेवर फीस
  • कारोबारी यात्रा
  • विज्ञापन और मार्केटिंग
  • वेबसाइट और होस्टिंग का खर्च

हर खर्च का पेशे से साफ संबंध होना चाहिए। उसके समर्थन में उचित रिकॉर्ड भी रखना चाहिए। व्यक्तिगत खर्च को कारोबारी खर्च के रूप में दावा नहीं किया जा सकता।

धारा 44ADA कब उपयोगी हो सकती है

धारा 44ADA निवासी व्यक्तियों के कुछ निर्दिष्ट पेशों से होने वाली आय की गणना आसान बनाती है। इसमें विस्तृत खाताबही रखने का प्रशासनिक बोझ कम होता है।

इस व्यवस्था में सकल पेशेवर प्राप्तियों का 50 प्रतिशत कर योग्य पेशेवर आय माना जाता है। सकल प्राप्तियों की सीमा 50 लाख रुपये है। यदि नकद प्राप्तियां कुल सकल प्राप्तियों के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, तो यह सीमा 75 लाख रुपये तक बढ़ जाती है।

धारा 44ADA हर फ्रीलांसर पर लागू नहीं होती। इसमें वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, CA, CS, तकनीकी सलाहकार, इंटीरियर डेकोरेटर, फिल्म कलाकार और सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़े पेशेवर शामिल हैं।

इस व्यवस्था और नियमित कर व्यवस्था के बीच चुनाव वास्तविक खर्चों की तुलना करके किया जाना चाहिए। कर्मचारियों या सहायकों, ऑफिस किराये, उपकरण, सॉफ्टवेयर और यात्रा पर खर्च अधिक हो सकता है। यदि वास्तविक खर्च सकल प्राप्तियों के 50 प्रतिशत से काफी ज्यादा है, तो नियमित कर व्यवस्था अधिक लाभकारी हो सकती है।

वहीं, वास्तविक खर्च कम होने पर धारा 44ADA अनुपालन को आसान बना सकती है। अनुमानित कराधान व्यवस्था में ऑडिट की जरूरत सामान्य तौर पर नहीं होती। हालांकि, जब घोषित लाभ योजना में तय लाभ से काफी कम हो, तब ऑडिट की जरूरत पड़ सकती है।

विदेशी ग्राहकों से मिली रकम भी बतानी होगी

निवासी फ्रीलांसर के लिए विदेशी ग्राहक से मिली आय आम तौर पर भारत में पेशेवर आय के रूप में कर योग्य होती है। ग्राहक का विदेश में होना अपने आप भारतीय टैक्स देनदारी नहीं बदलता।

आय को प्राप्ति की तारीख पर लागू SBI Telegraphic Transfer Buying Rate से रुपये में बदलने की बात कही गई है। बैंक स्टेटमेंट में दिखाई दे रही रुपये की रकम का इस्तेमाल किया जा सकता है। आय को पेशेवर आय वाली अनुसूची में दर्ज करना होता है।

जब कुल विदेशी आय अलग खुलासे की शर्त पूरी करती है, तब Schedule FSI भरना होता है। विदेशी ग्राहकों से भुगतान मिलने पर भारतीय TDS आम तौर पर नहीं कटता। इसलिए फ्रीलांसर को अपनी भारतीय टैक्स देनदारी खुद निकालकर एडवांस टैक्स देना होता है।

विदेशी ग्राहकों के लिए किया गया फ्रीलांस काम FEMA के तहत सेवाओं का निर्यात माना जाता है। भुगतान स्वीकृत बैंकिंग चैनल के जरिए आना चाहिए। बैंक हर प्राप्ति के लिए Foreign Inward Remittance Certificate जारी करता है।

हर FIRC और वायर ट्रांसफर रिकॉर्ड को कम से कम छह साल तक संभालकर रखने की बात कही गई है। विदेशी आय और विदेशी संपत्तियों से जुड़े खुलासे की शर्तें भी लागू ITR फॉर्म के अनुसार देखनी होती हैं।