बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर ने कहा है कि यूरोप ने कुछ देशों पर आर्थिक और सामरिक निर्भरता बढ़ाकर बड़ी गलती की। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोप को इस जोखिम के बारे में पहले ही आगाह किया था, लेकिन उस समय उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।
डी वेवर ने यह बात दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि यूरोप अब इस समस्या को समझ रहा है और ऐसे साझेदारों की तलाश कर रहा है, जो दबाव के बजाय सम्मान के साथ सहयोग करें।
सस्ते विदेशी सामान पर चिंता
बेल्जियम के प्रधानमंत्री के अनुसार, यूरोप ने लंबे समय तक सस्ते विदेशी सामान को अपने बाजार में बेरोकटोक आने दिया। इससे यूरोपीय कंपनियों पर दबाव बढ़ा और वे धीरे-धीरे कमजोर होती गईं।
उन्होंने कहा कि यूरोप को किसी एक देश के सामान के लिए डंपिंग जोन नहीं बनना चाहिए। उन्होंने देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनकी टिप्पणी को चीन से जोड़कर देखा जा रहा है।
यूरोप चीन से व्यापार में कुछ बुनियादी बदलाव चाहता है। इसके लिए अक्टूबर तक की डेडलाइन तय किए जाने की जानकारी है। अगर चीनी सामान की डंपिंग नहीं रुकी, तो यूरोपीय संघ चीन पर टैरिफ लगाने का विकल्प चुन सकता है।
भारत को साझेदारों की सूची में रखने पर जोर
डी वेवर ने कहा कि यूरोप को ऐसे सहयोगी चाहिए, जो बहुपक्षवाद में विश्वास रखते हों और रिश्तों में स्थिरता बनाए रखें। उन्होंने उन साझेदारों पर भी सवाल उठाया, जो एक दिन टैरिफ लगाते हैं, दूसरे दिन उसे हटाते हैं और असहमति होने पर फिर शुल्क लगा देते हैं।
उन्होंने कहा कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ रिश्ते बनाते समय भारत को सूची से बाहर रखना बुनियादी गलती होगी। उनके मुताबिक यूरोपीय काउंसिल की बैठकों में अब इन सभी मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
डी वेवर ने भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के लागू होने से पहले इसे महत्वपूर्ण संकेत बताया। दोनों पक्षों को उम्मीद है कि समझौते का क्रियान्वयन साल के आखिर तक शुरू हो जाएगा।
चीन के साथ व्यापार असंतुलन
यूरोप के बाजारों में चीन की मजबूत मौजूदगी का जिक्र करते हुए बताया गया कि चीन यूरोप को करीब 560 अरब यूरो का निर्यात करता है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी प्रमुख हैं। इसके मुकाबले यूरोप का चीन को निर्यात 200 अरब यूरो है।
व्यापार घाटे का आंकड़ा 1360 अरब यूरो बताया गया है। निर्यात और आयात के आंकड़ों तथा बताए गए घाटे के बीच अंतर की वजह स्पष्ट नहीं है।
यूरोपीय संघ आपूर्ति के मामले में किसी एक देश पर निर्भरता कम करना चाहता है। इसके साथ ही वह सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले सामान को अपने बाजार से रोकने पर जोर दे रहा है।
भारतीय निर्यातकों के लिए अवसर
यूरोपीय संघ चीन से आगे बढ़कर आपूर्ति श्रृंखला में दूसरे देशों की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इस बदलाव से भारत के लिए नए बाजार अवसर बन सकते हैं।
भारत पहले से यूरोप को मशीनरी, कपड़ा और रसायन निर्यात करता है। इन क्षेत्रों के अलावा भी विस्तार की गुंजाइश बताई गई है। यूरोपीय संघ के 27 देशों की मांग पूरी करने में भारत की भूमिका बढ़ सकती है।
भारत और यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय कारोबार 136 अरब डॉलर का है। इसमें भारत का निर्यात 75 अरब डॉलर और आयात 61 अरब डॉलर के करीब है। विशेषज्ञों के मुताबिक चीनी सामान पर यूरोपीय सख्ती से भारतीय निर्यातकों को फायदा मिल सकता है।
निष्कर्ष
डी वेवर का संदेश यूरोप की निर्भरता घटाने, स्थिर साझेदार चुनने और भारत के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने पर केंद्रित है। चीन से जुड़ी व्यापारिक चिंताओं के बीच भारत के लिए अवसर बढ़ने की संभावना बताई गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. बार्ट डी वेवर ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में क्या कहा?
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोप को आर्थिक और सामरिक निर्भरता के जोखिमों के बारे में पहले ही चेताया था।
Q. बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने यह बात कहां कही?
उन्होंने दिल्ली में भारतीय उद्योग परिसंघ के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह टिप्पणी की।
Q. डी वेवर का चीन को लेकर क्या संकेत था?
उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन सस्ते विदेशी सामान और डंपिंग जोन की टिप्पणी को चीन से जोड़कर देखा जा रहा है।
Q. यूरोपीय संघ चीन के खिलाफ क्या कदम उठा सकता है?
अगर चीनी सामान की डंपिंग नहीं रुकी, तो यूरोपीय संघ चीन पर टैरिफ लगाने का विकल्प चुन सकता है।
Q. भारत को इससे क्या फायदा हो सकता है?
यूरोप की आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव से भारतीय निर्यातकों के लिए मशीनरी, कपड़ा, रसायन और अन्य क्षेत्रों में अवसर बन सकते हैं।














