भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में है। शुक्रवार को इसमें 17 पैसे की मजबूती आई और यह 96.71 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। इसके बावजूद हाल की गिरावट को देखते हुए बाजार में यह चर्चा तेज है कि रुपया आने वाले दिनों में 100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकता है।
रुपये पर एक साथ कई दबाव काम कर रहे हैं। डॉलर मजबूत हुआ है, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं, भारतीय बाजार से विदेशी निवेशकों की बिकवाली हुई है और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में तेजी आई है। इन परिस्थितियों ने डॉलर की मांग बढ़ाई है और भारतीय मुद्रा के लिए मुश्किलें पैदा की हैं।
रुपये में कमजोरी के पीछे क्या है
भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। इसलिए तेल महंगा होने पर देश का ट्रेड बैलेंस प्रभावित होता है और आयात के भुगतान के लिए डॉलर की जरूरत बढ़ जाती है। कच्चा तेल पिछले कई दिनों से 100 डॉलर के पार बना हुआ है। कीमत में 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल करीब 18,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है।
तेल के अलावा अमेरिकी मुद्रा की मजबूती, यूएस बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी पूंजी का बाहर जाना भी रुपये को कमजोर कर रहा है। विश्लेषक हेजिंग पैटर्न और मुद्रा अनुमानों के आधार पर आगे भी रुपये पर दबाव बने रहने की संभावना जता रहे हैं।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि वित्तीय बाजार अल्पावधि में हमेशा तर्कसंगत तरीके से व्यवहार नहीं करते। उनके अनुसार, बाजार की धारणा और निवेशकों की करेंसी पोजिशन किसी मुद्रा का वास्तविक मूल्य हमेशा नहीं बताती। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय में बाजार किसी करेंसी का सही मूल्य तय करते हैं।
मल्होत्रा ने रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट यानी REER जैसे मानकों का हवाला देते हुए कहा कि रुपया ओवरवैल्यूड नहीं, बल्कि संभव है कि अंडरवैल्यूड हो। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब रुपये की बाजार दर में लगातार कमजोरी दिखाई दे रही है।
क्या 100 का स्तर संकट का संकेत है
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF का कहना है कि भारत रुपये पर दबाव झेलने की स्थिति में मजबूत है। IMF के एक प्रवक्ता के अनुसार, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर बढ़ाने की नीति से वैश्विक वित्तीय परिस्थितियां और सख्त हो सकती हैं। ऐसे माहौल में भारत विनिमय दर को बाहरी झटकों को absorb करने वाले माध्यम के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
IMF का रुख यह नहीं है कि रुपये को पूरी तरह बाजार की ताकतों के हवाले कर दिया जाए। उसके अनुसार, विनिमय दर में लचीलापन मुख्य शॉक एब्जॉर्बर होना चाहिए, जबकि केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप अस्थिर करने वाले जोखिम प्रीमियम, बाजार में अव्यवस्था, liquidity की कमी या घबराहट जैसी स्थिति तक सीमित रहना चाहिए।
इसका मतलब है कि आरबीआई रुपये को किसी एक खास संख्या पर रोकने के लिए हर स्थिति में बड़े पैमाने पर रिजर्व खर्च करे, यह जरूरी नहीं। बाजार बिगड़ने पर केंद्रीय बैंक डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर सकता है, लेकिन 96, 97 या 100 में से किस संख्या को अस्वीकार्य माना जाए, यह अपने आप में नीति का पर्याप्त आधार नहीं है।
एक्सिस बैंक के आकलन के मुताबिक, आरबीआई ने 2023 के मध्य से रुपये को सहारा देने के लिए लगभग $250 बिलियन बेचे हैं। बैंक का मानना है कि बाहरी फंडामेंटल्स में आगे भी कुछ समायोजन की जरूरत हो सकती है।
कमजोर रुपये से किसे फायदा, किसे नुकसान
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और 16वें फाइनेंस कमीशन के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया के अनुसार, मुद्रा में गिरावट हमेशा नुकसानदेह नहीं होती। भारतीय उत्पादक विदेशी बाजारों के साथ-साथ देश में बिकने वाले आयातित उत्पादों से भी मुकाबला करते हैं।
कमजोर रुपये से आयातित मशीनरी और कंपोनेंट महंगे हो सकते हैं। लेकिन भारत में प्रतिस्पर्धा करने वाला आयातित तैयार उत्पाद भी रुपये में महंगा हो जाता है। निर्यातकों के लिए कमजोर मुद्रा कम डॉलर कीमत पर उत्पाद पेश करने की गुंजाइश बढ़ा सकती है।
फिर भी भारत ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं है जो केवल निर्यात पर निर्भर हो और मुद्रा कमजोर होने से सीधे समृद्ध हो जाए। उत्पादन का बड़ा हिस्सा आयातित इनपुट पर निर्भर है। कच्चे तेल के अलावा फर्टिलाइजर, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स के पुर्जे और कैपिटल गुड्स भी इसका हिस्सा हैं।
यही वजह है कि रुपये में गिरावट का नुकसान पहले दिखाई दे सकता है, जबकि निर्यात से मिलने वाला लाभ बाद में आएगा। आयातित कच्चा माल और पुर्जे तुरंत महंगे हो सकते हैं, लेकिन निर्यात प्रतिस्पर्धा का फायदा मिलने में महीनों या सालों का समय लग सकता है। इससे महंगाई बढ़ने का जोखिम रहता है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के चीफ इकनॉमिस्ट मदन सबनवीस ने कहा है कि रुपया अगले साल 3-4% और गिर सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे आयातित महंगाई का दबाव बना रह सकता है।
आगे नीति की चुनौती
अरविंद पनगढ़िया के अनुसार, 100 पर रुपया पहुंचना अपने आप में आर्थिक अर्थ रखने वाली कोई जादुई सीमा नहीं है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो रुपये को एक स्तर पर रोकने के लिए रिजर्व खर्च करने से मूल समस्या खत्म नहीं होगी।
फिर भी 100 का आंकड़ा मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण होगा और बाजार की उम्मीदों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अहम सवाल यह हैं कि महंगाई काबू में रहती है या नहीं, पूंजी का प्रवाह बाहरी घाटे को पूरा कर पाता है या नहीं, आगे की देनदारियों को देखते हुए विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त रहता है या नहीं और विनिमय दर भारत के बाहरी फंडामेंटल्स के अनुरूप है या नहीं।
निष्कर्ष
रुपये का 100 तक पहुंचना अपने आप में संकट का प्रमाण नहीं होगा। समझदारी वाली नीति यह होगी कि विनिमय दर को बाहरी झटकों का कुछ हिस्सा झेलने दिया जाए और बाजार में घबराहट बढ़ने पर हस्तक्षेप की क्षमता बनाए रखी जाए। कमजोर रुपये से निर्यात को मदद मिल सकती है, लेकिन आयातित महंगाई और महंगे तेल का दबाव भी बढ़ सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. रुपया 100 की ओर क्यों बढ़ रहा है?
डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की ऊंची कीमत, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
Q. शुक्रवार को रुपये की स्थिति क्या रही?
रुपया 17 पैसे मजबूत होकर 96.71 प्रति डॉलर पर बंद हुआ।
Q. महंगे तेल का रुपये पर क्या असर पड़ता है?
भारत लगभग 90% कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से आयात बिल और डॉलर की मांग बढ़ती है।
Q. तेल की कीमत में 1 डॉलर की बढ़ोतरी का क्या असर पड़ता है?
इससे भारत का सालाना आयात बिल करीब 18,000 करोड़ रुपये बढ़ जाता है।
Q. क्या कमजोर रुपये से निर्यातकों को फायदा हो सकता है?
कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों को कम डॉलर कीमत पर उत्पाद पेश करने की गुंजाइश दे सकता है।
Q. कमजोर रुपये से नुकसान कैसे हो सकता है?
आयातित तेल, मशीनरी, कंपोनेंट्स और दूसरे इनपुट महंगे हो सकते हैं। इससे आयातित महंगाई बढ़ने का दबाव बन सकता है।
Q. IMF रुपये को लेकर क्या कहता है?
IMF के अनुसार भारत रुपये पर दबाव झेलने की स्थिति में मजबूत है और विनिमय दर बाहरी झटकों को absorb करने का माध्यम बन सकती है।
Q. क्या 100 का स्तर अपने आप में आर्थिक संकट दिखाता है?
नहीं। यह मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण स्तर हो सकता है, लेकिन आर्थिक स्थिरता और संकट के बीच कोई जादुई सीमा नहीं है।







