भारत में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर बहस के बीच उसके भीतर सामने आए 4 मामले फिर चर्चा में हैं। इन घटनाओं में मतदाता सूची के बदलाव, चुनावी फैसलों में असहमति, नियुक्तियों और आयुक्तों के इस्तीफे से जुड़े सवाल शामिल हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन दिसंबर 1990 से दिसंबर 1996 तक पद पर रहे थे। चुनाव आयोग की भूमिका पर चर्चा में उनका यह विचार अक्सर याद किया जाता है कि आयोग भारत का है, भारत सरकार का नहीं।
SIR को लेकर आयोग के भीतर मतभेद
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने एसआईआर (Special Intensive Revision) शुरू किया था। आयोग ने इसे नियमित प्रक्रिया बताया। इस प्रक्रिया के तहत अब तक वोटर लिस्ट से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने की बात कही गई है। इसी वजह से आयोग की भूमिका और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर तीखी बहस हुई।
विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार चुनाव आयोग के जरिए अपनी पसंद के अनुसार वोटर लिस्ट तैयार करवा रही है। केंद्र सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।
इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के अनुसार, 3 सदस्यीय आयोग में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों का कहना था कि कई फैसले और आदेश उनकी जानकारी के बिना लिए गए। एक दिन 4 बार ऐसी आपत्तियां दर्ज होने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने और मतदाता सूची से नाम हटाने से जुड़े फैसले शामिल थे। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने कुछ कदमों को 'अनधिकृत और अवैध' बताया। उन्होंने यह भी कहा कि मतदाता डेटाबेस तक पहुंच दिल्ली में केंद्रीकृत करके राज्य अधिकारियों को दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए।
सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई और कैबिनेट सचिव से शिकायत की। इन आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और संबंधित काम की निगरानी कर रहे कुछ उप चुनाव आयुक्तों को भेजी गई थीं।
आयोग का जवाब
रिपोर्ट के बाद आयोग ने एक्स पर 8 बिंदुओं वाला बयान जारी किया। आयोग ने कहा कि 10 महीनों के दौरान लिए गए कई फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करके कुछ अंदरूनी नोट या बातचीत पर जोर देने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
आयोग के अनुसार, हाल के महीनों में करीब 40 नई पहल शुरू की गईं और कई चुनावी सुधार किए गए। इनमें पूरे देश में वोटर लिस्ट में सुधार, एसआईआर सहित, शामिल है। आयोग ने कहा कि पिछले एक साल में लिए गए ये फैसले पूरे कमीशन की आम सहमति से हुए।
2019 में अशोक लवासा की असहमति
मोदी सरकार के कार्यकाल में आयोग के भीतर असहमति सार्वजनिक होने का यह पहला मामला नहीं है। मई 2019 में तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा से असहमति जताई थी।
लवासा चाहते थे कि आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े आयोग के आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय भी दर्ज की जाए। शिकायतों का जल्दी निपटारा करने के उनके सुझाव पर कार्रवाई नहीं होने और अंतिम आदेशों में उनकी राय दर्ज न किए जाने के बाद उन्होंने 16 मई 2019 को ऐसी बैठकों से खुद को अलग कर लिया था।
लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के आरोपों में दी गई क्लीन चिट पर लवासा ने 5 बार असहमति जताई थी।
सुनील अरोड़ा ने कहा था कि आयुक्तों के बीच असहमति आयोग की चारदीवारी के भीतर रहना बेहतर है। उनके मुताबिक, चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाना जरूरी है और गलत समय पर विवाद खड़े करना वांछनीय नहीं है।
उस समय कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रही है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने लवासा की असहमति को चुनाव आयोग पर राजनीतिक दबाव से जोड़ा था।
अरुण गोयल का इस्तीफा
2024 के आम चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने इस्तीफा दे दिया था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उनका इस्तीफा 9 मार्च से प्रभावी मानकर स्वीकार किया। उनका कार्यकाल 2027 तक था। इस्तीफा ऐसे समय हुआ, जब लोकसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कुछ ही दिनों में होने की उम्मीद थी।
कांग्रेस ने इस घटनाक्रम पर चिंता जताई। कांग्रेस महासचिव संगठन के.सी. वेणुगोपाल ने चुनाव आयोग के कामकाज और सरकार के कथित दबाव को लेकर पारदर्शिता पर सवाल उठाया था।
2009 का एन. गोपालस्वामी मामला
जनवरी 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफारिश भेजी थी। यह मामला भी चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और उसकी संस्थागत भूमिका पर चर्चा का आधार बना।
नियुक्तियों पर भी उठे सवाल
तीनों चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 2023 के कानून के तहत हुई थी। चयन समिति में प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल थे।
मार्च 2024 में सुखबीर सिंह संधू और ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उस समय समिति में विपक्ष के सदस्य कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने प्रक्रिया पर असहमति दर्ज की थी। फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त बनाए जाने पर राहुल गांधी ने भी असहमति दर्ज की थी।
इन घटनाओं को साथ रखकर देखें तो बहस केवल किसी एक फैसले तक सीमित नहीं रहती। इसमें आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, असहमति दर्ज करने की व्यवस्था और मतदाता सूची से जुड़े कामकाज की पारदर्शिता जैसे सवाल शामिल हैं।
निष्कर्ष
चुनाव आयोग के भीतर असहमति के 4 मामले उसकी संस्थागत पारदर्शिता और स्वतंत्रता पर चल रही बहस को सामने लाते हैं। SIR पर आयुक्तों की आपत्तियों के साथ आयोग का जवाब भी सार्वजनिक है, जबकि पुराने मामलों में असहमति दर्ज करने और इस्तीफे से जुड़े सवाल उठे थे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q. चुनाव आयोग के भीतर SIR को लेकर क्या विवाद है?
SIR के दौरान मतदाता सूची में बड़े बदलाव और 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जाने की बात को लेकर बहस हुई। 2 चुनाव आयुक्तों ने फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की।
Q. सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कितनी आपत्तियां दर्ज कीं?
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की।
Q. चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर क्या कहा?
आयोग ने कहा कि हाल के फैसले, निर्देश और करीब 40 नई पहल पूरे कमीशन की आम सहमति से की गईं।
Q. अशोक लवासा का 2019 का मामला क्या था?
लवासा चाहते थे कि आदर्श आचार संहिता से जुड़े आदेशों में असहमति या अल्पमत की राय दर्ज हो। उनकी राय दर्ज न होने पर उन्होंने 16 मई 2019 को संबंधित बैठकों से खुद को अलग कर लिया था।
Q. अरुण गोयल ने कब इस्तीफा दिया था?
अरुण गोयल का इस्तीफा 9 मार्च से प्रभावी माना गया था। यह इस्तीफा 2024 के आम चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से कुछ दिन पहले हुआ।









