चीन ने गहरे अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यान को खुद नेविगेट कराने वाली तकनीक का परीक्षण किया है। यह कदम 2030 के लिए प्रस्तावित बृहस्पति मिशन Tianwen-4 की तैयारी से जुड़ा है। तकनीक तारों की रोशनी में होने वाले बेहद छोटे बदलावों को मापकर यान की गति और दिशा का अनुमान लगाती है।

इस तरीके को तारकीय विचलन नेविगेशन (Stellar Aberration Navigation) कहा जाता है। इसमें अंतरिक्ष यान को हर समय धरती से ट्रैकिंग और कमांड की जरूरत नहीं पड़ती। चीन की प्रमुख अंतरिक्ष यान निर्माता संस्था China Academy of Space Technology के शोधकर्ताओं ने इस परीक्षण का विवरण एक शोधपत्र में दिया है। यह शोधपत्र Journal of Deep Space Exploration में प्रकाशित होगा।

Tianhui-7 ने कैसे किया परीक्षण

Tianhui-7 को 30 दिसंबर 2025 को उत्तर-पश्चिमी चीन के Jiuquan Satellite Launch Centre से Long March 4B रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया था। उस समय इसे भौगोलिक मैपिंग, भूमि सर्वेक्षण और वैज्ञानिक शोध के लिए बताया गया था।

नए शोध के अनुसार, उपग्रह में 3 बेहद सटीक स्टार कैमरे और एक इंफ्रारेड सेंसर लगाया गया था। करीब 500 किलोमीटर की ऊंचाई पर कक्षा में 20 घंटे तक इस सिस्टम का परीक्षण हुआ। इस प्रयोग में धरती ने बृहस्पति की जगह ली।

कैमरों ने आकाश के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीरें लीं। इंफ्रारेड सेंसर ने धरती का निरीक्षण किया। इन दोनों तरह के मापों को मिलाकर उपग्रह ने अपनी स्थिति और गति का अनुमान लगाया। शोधकर्ताओं ने इन नतीजों की तुलना GPS आंकड़ों से की।

परीक्षण के दौरान स्थिति की त्रुटि करीब 5 किलोमीटर और गति की त्रुटि 5 मीटर प्रति सेकंड रही। बाद में व्यवस्थित त्रुटियों को सुधारने पर स्थिति की सटीकता 4 किलोमीटर से बेहतर और गति की सटीकता 4 मीटर प्रति सेकंड से बेहतर हो गई।

तारों की रोशनी से दिशा कैसे मिलती है

तारकीय विचलन का पता करीब 300 साल पहले अंग्रेज खगोलशास्त्री James Bradley ने लगाया था। उन्होंने देखा कि धरती के सूर्य के चारों ओर घूमने के दौरान तारों की स्थिति आकाश में थोड़ी बदली हुई दिखाई देती है।

तारे वास्तव में आगे-पीछे नहीं हो रहे होते। धरती या अंतरिक्ष यान जब अंतरिक्ष में आगे बढ़ता है, तो आने वाली तारों की रोशनी का कोण थोड़ा बदल जाता है। यह उसी तरह है जैसे चलती कार की विंडस्क्रीन से बारिश देखने पर बूंदें तिरछी आती हुई लगती हैं।

यह बदलाव बहुत छोटा होता है, लेकिन अनुमानित होता है। तारों की दिखाई देने वाली स्थिति में इस बदलाव को मापकर वैज्ञानिक यह गणना कर सकते हैं कि अंतरिक्ष यान कितनी तेज गति से और किस दिशा में बढ़ रहा है।

NASA के StarNAV से जुड़ी तकनीक

NASA ने 2020 में StarNAV नाम की प्रयोगात्मक परियोजना को फंड किया था। इसका उद्देश्य तारों की स्थिति को बेहद सटीक तरीके से मापकर रोशनी के आधार पर नेविगेशन करना है। इस स्तर पर कोणों को मिलीआर्कसेकंड में मापना पड़ता है। एक मिलीआर्कसेकंड, 500 किलोमीटर दूर से चावल के एक दाने की दिखाई देने वाली चौड़ाई के बराबर बताया गया है।

Tianhui-7 के स्टार कैमरे करीब 50 मिलीआर्कसेकंड तक सटीक माप कर सकते थे। कैमरों में लॉन्च के कंपन और तापमान में बदलाव से होने वाली हलचल को संभालने के लिए चीनी टीम ने एक ऑप्टिकल रेफरेंस सिस्टम भी जोड़ा।

बृहस्पति मिशन के लिए महत्व और सीमा

बृहस्पति धरती से 900 मिलियन किलोमीटर तक दूर हो सकता है। वहां से रेडियो सिग्नल को एक दिशा में पहुंचने में 50 मिनट से अधिक लग सकते हैं। ऐसे अंतराल में धरती से रियल-टाइम निर्देश देकर किसी स्थिति का तुरंत जवाब देना संभव नहीं होगा।

चीन बृहस्पति तक अंतरिक्ष यान को ट्रैक कर सकता है, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार गहरे अंतरिक्ष में उसकी ट्रैकिंग सटीकता NASA या European Space Agency जितनी नहीं है। Tianwen-4 चीन का बृहस्पति प्रणाली का पहला मिशन होगा। इसमें बृहस्पति और उसके चंद्रमाओं के विकास, वातावरण और आंतरिक संरचना का अध्ययन किया जाना है।

फिर भी Tianhui-7 का प्रदर्शन सीधे बृहस्पति की कक्षा में सफलता की गारंटी नहीं देता। शोधकर्ताओं ने कहा कि बृहस्पति के आसपास की परिस्थितियां धरती की निचली कक्षा से काफी अलग होंगी। इसलिए वहां इस तकनीक का प्रदर्शन अभी जांचा जाना बाकी है।

चीन मिलीआर्कसेकंड स्तर के और अधिक सटीक स्टार कैमरे भी विकसित कर रहा है। 2025 में China Aerospace Science and Technology Corporation की वेबसाइट पर प्रकाशित एक लेख के अनुसार, ऐसे कैमरे का प्रोटोटाइप बनाया जा चुका है और उसका जमीन पर परीक्षण भी हुआ है।

निष्कर्ष

Tianhui-7 के परीक्षण ने तारों की रोशनी से स्वायत्त नेविगेशन की व्यवहारिक क्षमता दिखाई है। चीन के लिए अगली बड़ी चुनौती यही तकनीक बृहस्पति के आसपास सफलतापूर्वक इस्तेमाल करना होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

Q. चीन की नई अंतरिक्ष नेविगेशन तकनीक क्या है?

यह तारों की रोशनी में होने वाले छोटे बदलावों को मापकर अंतरिक्ष यान की गति, दिशा और स्थिति का अनुमान लगाती है।

Q. Tianhui-7 परीक्षण में कितनी सटीकता मिली?

शुरुआत में स्थिति की त्रुटि करीब 5 किलोमीटर और गति की त्रुटि 5 मीटर प्रति सेकंड रही। सुधार के बाद ये आंकड़े 4 किलोमीटर और 4 मीटर प्रति सेकंड से बेहतर हुए।

Q. Tianhui-7 का परीक्षण कितने समय और ऊंचाई पर हुआ?

परीक्षण 20 घंटे तक करीब 500 किलोमीटर ऊंची कक्षा में किया गया।

Q. बृहस्पति मिशन के लिए यह तकनीक जरूरी क्यों है?

बृहस्पति से रेडियो सिग्नल को धरती तक एक दिशा में पहुंचने में 50 मिनट से अधिक लग सकता है। इसलिए अंतरिक्ष यान की स्वायत्त नेविगेशन क्षमता उपयोगी हो सकती है।

Q. चीन का Tianwen-4 मिशन क्या करेगा?

यह बृहस्पति प्रणाली, उसके चंद्रमाओं, उनके विकास, वातावरण और आंतरिक संरचनाओं का अध्ययन करेगा।

Q. क्या यह तकनीक बृहस्पति की कक्षा में साबित हो चुकी है?

नहीं। शोधकर्ताओं ने कहा है कि वहां की अलग परिस्थितियों में इसका प्रदर्शन अभी जांचा जाना बाकी है।